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Wednesday, April 22, 2020

भगवान महावीर

महावीर जयंती,महावीर स्वामी के सिद्धांत,bhagwan mahavir jayanti
                                                                                  भगवान महावीर
                                                        भगवान महावीर 
        भगवान महावीर स्वामी का जन्म 599 वर्ष पूर्व (ईसा से ) कुंडग्राम (बिहार),भारत मे हुआ । जैन धर्म के
        24 वें तीर्थंकरभगवान महावीर हुये | वर्तमान में वैशाली (बिहार) के वासोकुण्ड को यह स्थान है। 23वें
        तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के 188 वर्ष बाद इनका जन्म हुआ था | 
        महावीर जयंती जैन समुदाय का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है।
     
        जैन ग्रंथों के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को जैन समाज के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का
        जन्म हुआ था, जिस कारण जैन धर्म के लोग इस दिन को उनके जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं |

       भगवान महावीर ने दुनिया को अहिंसा परमो धर्म का संदेश दिया | भगवान महावीर को बचपन मे वर्धमान
       नाम से जाना जाता था | इनका जन्म लिच्छ्हवी वंश के महाराज सिद्धार्थ व महारानी त्रिशला के हुआ
       भगवान महावीर ने ज्ञान प्राप्ति के लिए 30 साल की उम्र में राजमहलो के सुखो को छोड़ दिया |
       भगवान महावीर ने तपोमय साधना का रास्ता चुना और 12 वर्षो का कठोर तप कर अपनी इंद्रियो
       को जीत लिया |

                                                                    सिद्धांत
       भगवान महावीर ने अहिंसा परमो धर्म के सिद्धांत पर ज़ोर दिया और भगवान महावीर ने अपने अनुयायीयो
       को अहिंसा,सत्य,अस्तेय,अपरिगृह और ब्रह्मचर्य पंच वर्तो का पालन करना जरूरी बताया है | अहिंसा ही
       सुख शांति देने वाली है,यही मानव का सच्चा धर्म और कर्म है |

                                                                     पंच व्रत

1.     सत्य ―  भगवान महावीर स्वामी सत्य के बारे बताया हैं की - " हे पुरुष ! सत्य ही सच्चा तत्व है ।
                       जो बुद्धिमान सत्य को जान लेता है, वह मृत्यु को भी तैरकर पार कर लेता है।

2.     अहिंसा – " इस संसार में जितने भी एक, दो, तीन, चार और पाँच इंद्रीयों वाले जीव है |
                         उनकी हिंसा मत करो, उनको उनके रास्ते पर जाने से मत रोको । इन सब के लिए अपने मन
                         में दया का भाव रखो । इनकी रक्षा करो । यही अहिंसा का संदेश भगवान महावीर अपने
                         उपदेशों दिया हैं। "

3.     अचौर्य -   " जब तक कोई अपनी वस्तु स्वंम न दे, बिना उसके दिए कोई ग्रहण करता है तो उसे जैन ग्रंथों
                          में चोरी कहा गया है "।

4.    अपरिग्रह – " अपरिग्रह पर भगवान महावीर कहना हैं की जो खुद सजीव या निर्जीव वस्तुओ का संग्रह
                           करता है, दूसरों से इस प्रकार का संग्रह कराता है या किसी को ऐसा संग्रह करने की सम्मति
                           देता है, उसे दुःखों से कभी छुटकारा नहीं मिल पाएगा । ये संदेश अपरिग्रह के द्वारा
                           भगवान महावीर ने दुनिया को दिया हैं ।"

5.   ब्रह्मचर्य-     " भगवान महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में बहुत ही अमूल्य उपदेश देते हैं कि ब्रह्मचर्य
                            उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय की मूल जड़ है । तपस्या में                                ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है । जो पुरुष स्त्रियों से संबंध नहीं रखते, वे मोक्ष मार्ग की ओर
                            बढ़ते हैं। "

                                                                      धर्म
             जैन ग्रंथों में दस धर्म का वर्णन पाया जाता है । पर्युषण पर्व, जिन्हें दस लक्षण भी कहा जाता है,
             पर्युषण पर्व के समय दस दिन इन दस धर्मों का चिंतन किया जाता है।
             धर्म सबसे अधिक मंगल है। अहिंसा, संयम और तप धर्म के रूप है। भगवान महावीर ने कहा की- " जो
           धर्मात्मा है, जिसके मन में सदैव धर्म रहता है, उसे देवता भी नमन करते हैं।
           भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, क्षमा पर अत्यधि
 जोर दिया । त्याग,करुणा,प्रेम,संयम,शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का मूल है ।"


                                                                      क्षमा
             क्षमा के बारे में भगवान महावीर बताते हैं की - " मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूँ । जगत के सभी जीवों
             के प्रति मेरा मैत्रीभाव है । मेरा किसी से वैर नहीं है । मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूँ । सब जीवों
             से मैं सारे अपराधों की क्षमा माँगता हूँ । सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किए हैं, उन्हें मैं क्षमा
             करता हूँ ।"

            भगवान महावीर ने बताया है की- " मैंने अपने मन में जिन-जिन पाप की वृत्तियों का संकल्प किया
            हो, वचन से जो-जो पाप वृत्तियाँ प्रकट की हों और शरीर से जो-जो पापवृत्तियाँ की हों, मेरी वे सभी
            पापवृत्तियाँ विफल हों । मेरे वे सारे पाप मिथ्या हों ।"


                                                                  मोक्ष
        भगवान महावीर ने ईसापूर्व 527, 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावापुरी में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को
        मोक्ष प्राप्ति की । पावापुरी में एक जल मंदिर स्थित है जिसके बारे में कहा जाता है कि ये वो स्थान है जहाँ
        से महावीर स्वामी को मोक्ष की प्राप्ति की थी।


                                                     
                                                       महावीर का संघ 
         भगवान महावीर ने कैवल्य ज्ञान मार्ग को पुष्ट करने हेतु अपने अनुयायियों के चार भाग किए- मुनि,
         आर्यिका, श्रावक और श्राविका।
         प्रथम दो वर्ग गृहत्यागी परिव्राजकों के लिए बनाया और अंतिम दो गृहस्थों के लिए बनाया।
         यही भगवान महावीर का चतुर्विध-संघ कहलाया ।

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